हाईकोर्ट ने गंगा, यमुना प्रदूषण मामले में केन्द्र, राज्य से मांगा जवाब

नैनीताल । गंगा एवं यमुना नदी में बढ़ रहे प्रदूषण को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारें गंभीर नहीं हैं। दोनों नदियों में बढ़ रहे प्रदूषण को लेकर सरकारों ने अभी तक उत्तराखंड उच्च न्यायालय में जवाब फाइल नहीं किया है। न्यायालय ने केन्द्र समेत सभी पांच राज्यों को एक बार फिर जवाब देने का मौका दिया है। अदालत ने उनसे यह भी पूछा है कि गंगा एवं यमुना नदी को प्रदूषणमुक्त करने के संबंध में उन्होंने क्या कदम उठाये हैं? न्यायालय की ओर से केन्द्र के अलावा जिन राज्यों को नोटिस जारी किया है उनमें हरियाणा, राष्ट्रीय राजधानी, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड राज्य शामिल हैं। 

इनके अलावा अदालत ने राज्य मिशन फाॅर क्लीन गंगा एवं उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी जवाब देने को कहा था। इस मामले में न्यायमित्र अधिवक्ता नियुक्त अजयवीर सिंह पुंडीर ने बताया कि केन्द्र समेत सभी राज्य सरकारों की ओर से शु्क्रवार को भी अदालत में जवाब पेश नहीं किया गया है। दिल्ली सरकार की ओर से अधिवक्ता वी.वी.एस. नेगी अदालत में पेश हुए। 

उन्होंने भी जवाब पेश करने के लिये अदालत से और समय की मांग की। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की युगलपीठ ने सभी राज्यों को जवाब पेश करने के लिये छह सप्ताह का और समय दिया। दरअसल दिल्ली निवासी अजय गौतम ने पिछले साल सितम्बर में गंगा में बढ़ रहे प्रदूषण को लेकर उच्च न्यायालय को एक पत्र भेजा था। इसके बाद न्यायालय ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए एक जनहित याचिका दायर कर ली।

श्री गौतम की ओर से पत्र में कहा गया था कि गंगा एवं यमुना नदी में प्रदूषण की मात्रा काफी बढ़ गयी है। दोनों नदियों का पानी काफी प्रदूषित हो गया है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगा एवं यमुना नदियों का बड़ा महत्व है। विभिन्न प्रकार के अनुष्ठानों में गंगा जल का प्रयोग किया जाता है। जो कि उसके योग्य नहीं रह गया है। प्रदूषण के चलते गंगा का पानी आचमन के योग्य भी नहीं रह गया है। 

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