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पंकज शर्मा All Article

कमलनाथ, दिग्विजय, सिंधिया और सभा-पर्व

मैं इस हफ्ते भोपाल में था। भोपाल का ताल पंद्रह बरस बाद हिलोरें ले रही नई सियासी-तालों से ताल मिलाने के लिए पांव थिरका रहा है। और पढ़ें....

सिंहासन का दायित्व-बोध उनके ठेंगे पर

भारत के अच्छे दिन लाने की शपथ ले कर सत्ता में आए और साढ़े चार बरस में देश को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्कारों के पाषाण-काल में खींच ले गए हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने और कुछ चुराया है या नहीं, और पढ़ें....

मोदी का पूर्ण-विराम और भाजपा का अर्द्ध-विराम

दो दिन बाद 2019 शुरू हो जाएगा। नरेंद्र भाई मोदी के पराक्रम तले कराहती मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल 154 दिन बाकी रह जाएगा। 3 जून की सांझ ढलने के पहले 17वीं लोकसभा का गठन होना है। और पढ़ें....

कमलनाथ, गहलोत और बघेल का कर्मयोग

मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें अगर इस बार न बनतीं और तेलंगाना और मिजोरम में लोगों ने भारतीय जनता पार्टी को दूर से ही प्रणाम न कर दिया होता और पढ़ें....

ऐरावत पर बैठे राहुल की जिम्मेदारियां

विधानसभा चुनावों के नतीजे आने से एक पखवाड़े पहले, 24 नवंबर को, अपने इस स्तंभ में मैं ने लिखा था कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा की 679 सीटों में से इस बार भारतीय जनता पार्टी 200 का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगी। और पढ़ें....

सामाजिक बोध के सूर्योदय का समय

नरेंद्र भाई मोदी ने केंद्र की सरकार संभालने के बाद अपने प्रचार पर सरकारी ख़जाने से 50 अरब रुपए खर्च कर डाले हैं। इतना पैसा हमारे देश में ग़रीबी की सीमा रेखा से नीचे रहने वाले सभी लोगों की एक हफ़्ते की ज़रूरतें पूरी करने को काफी था। और पढ़ें....

सूंड में चींटी के प्रवेश का जीवंत नज़ारा

छह महीने में हुआ राहुल गांधी का रूपांतरण कुछ लोगों के लिए कल्पनातीत है। लेकिन पिछले कम-से-कम आठ साल से, और ख़ासकर पिछले साढ़े चार साल में, मैं ने बार-बार लिखा कि एक दिन आएगा और पढ़ें....

पांच प्रदेशों के चुनावी नतीजों का पवन-सुत

मैं इस बीच, पूरे एक पखवाड़े, मध्यप्रदेश के घनघोर आदिवासी इलाक़ों में भी था और कारोबारी महानगरीय इलाक़ों में भी। पांच विधानसभाओं के लिए हो रहे इन चुनावों को अगले बरस के आम चुनावों की परछाईं माना जा रहा है और वे हैं भी। और पढ़ें....

धू-धू लपटों के बीच नए ऋग्वेद की रचना

अपने को बड़े-बड़़े अर्थशास्त्रियों से ज़्यादा अक़्लमंद समझने के गुरूर में अगर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने नोटबंदी की गुलाबी फसल काटने के ऐवज में हम से पचास दिन मांगे थे तो अब उन्हें अपना झोला उठा कर चुपचाप घर चले जाना चाहिए। और पढ़ें....

खो-खो खेलते राजा की दी सौगात पर थिरकती प्रजा

इससे क्या कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ऐसे तमाम बुनियादी मोर्चों पर नाकाम हो गए, जिनसे किसी भी राष्ट्र का निर्माण होता है; उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा तो ‘मां नर्मदा की पावन पवित्र धरा के किनारे’ स्थापित कर के दिखा ही दी। और पढ़ें....

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