Thursday

03-04-2025 Vol 19

पंकज दुबे

ख़ामोशी में दहाड़: ‘द डिप्लोमैट’

the diplomat : फिल्म चुस्त है, स्क्रिप्ट और एडिटिंग दुरुस्त। फ़िल्म के एडिटर हैं कुणाल वाल्वे। फ़िल्म कासी हुई है और इसकी अवधि है, दो घंटे 17 मिनट।

सपनों को सच करते ‘द मेहता बॉयज़’

क़िस्सागोई के अलग अलग आयाम साधने वाले कलाकारों की क़ाबिलियत का रस लेने के लिए सबसे ज़रूरी है ये समझना कि उन्हें किसी पारम्परिक नौकरीशुदा इंसान की तरह देखने...

सच की आंच पर पकीः ‘द स्टोरीटेलर’

बहुत दिनों बाद हिंदी फ़िल्मों की दुनिया में एक ऐसी फ़िल्म आई है, जिसमें 'प्लेजरिज़्म' (साहित्यिक चोरी) को कहानी के केंद्र में रखा गया है।

पाताल लोक: ख्वाहिशों के ख़ूबसूरत झमेले

2025 की शुरुआत, दर्शकों के लिए वेब सीरीज़ की दुनिया में एक सुनहरा दौर लेकर आई है।

मौन की भाषा: ‘बर्लिन’

ऐसा अक्सर होता है कि बहुत बड़ी फिल्मों के अग्रेसिव प्रमोशन के शोर में कई छोटी और दिलचस्प फ़िल्मों की तरफ़ ध्यान थोड़ी देर से जाता है।

ज़िद जो न कराए: ‘सिकंदर का मुकद्दर’

निर्देशक नीरज पांडे ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे थ्रिलर शैली के मास्टर हैं।

वर्जनाओं को तोड़ने की एक सार्थक पहल

इस शब्द के किसी पब्लिक प्लेस या फिर घर की गैदरिंग में भी उच्चारण मात्र से ऐसा लगता है जैसे कोई बम फट जाता हो।

भावनात्मक आघात से आगे बढ़ने की कहानी

ये फ़िल्म इसी नाम से 2016 में छपे कोलीन हूवर के मशहूर उपन्यास पर आधारित है।

शिक्षा पर सार्थक फिल्मों की जरुरत

राजनीतिक घटनाक्रमों और राजनेताओं पर हमेशा फ़िल्में बनती रहीं हैं। जब जिस विचारधारा का ज़्यादा प्रभाव रहता है, उसके पक्ष की कहानियां प्रमुखता पातीं हैं

हॉरर, मिथ और सिनेमाई जादू

'तुम्बाड' देखना एक ऐसा अनुभव है, जो आपको डराता भी है, सोचने पर मजबूर भी करता है, और सिनेमाई स्तर पर गहरे तक छू जाता है।

इंसानी जिजीविषा का नाम है ‘श्रीकांत’

'श्रीकांत' एक बायोपिक है, जिसमे मनोरंजन के साथ साथ मोटिवेशन का भी एक संतुलित अनुपात है।